आ जुग मा देह अभिमान घणु भजन लिरिक्स | aa jug ma abhiman ghano bhajan lyrics

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आ जुग मा देह अभिमान घणु भजन लिरिक्स

आ जुग मा देह अभिमान घणु भजन लिरिक्स, aa jug ma abhiman ghano gujarati bhajan lyrics

।। दोहा ।।
सतगुरु आवत देखिया, कंधे लाल बन्दुक।
गोली दागी हरी नाम की, भाग गया जम दूत।


~ आ जुग मा देह अभिमान घणु ~

आ जुग मा छे ,
देह अभिमान घणु।
तेणे करी ने भोगवे ई ,
आतम जीव अणु।


सांचे मन थी सतगुरु साथे ,
होइए न आणु हेत।
संत ने न नम्यो हरी ने न गम्यो ,
अन्ते थयो फजेत।
सुख दुःख महा व्यापे ,
आनंद नहीं आवे अणु।
आ जुग मा छे ,
देह अभिमान घणु। टेर ….


महारु महारु करतो प्राणी ,
जादू जतन करे।
आ संसार स्वप्न सरीखो ,
अर्थ न एक सरे।
काई नथी लेता ए ,
कारण प्रभुद्ध तणु।
आ जुग मा छे ,
देह अभिमान घणु। टेर ….


जय विजय अहंकारे चढ़िया ,
पड़िया द्रोह ने द्वार।
तू तो प्रकट पामर प्राणी ,
कोण मात्र विचार।
जसे एम उडीने रे ,
तुर जेम आक तणु।
आ जुग मा छे ,
देह अभिमान घणु। टेर ….


तन अभिमान मन अभिमान ,
अभिमान कहे।
झूठ्यो बोले चाले ,
लख चौरासी वहे।
भजन हरी नो बेसी ने ,
न किधु एक क्षणु।
आ जुग मा छे ,
देह अभिमान घणु। टेर ….


सात शास्त्र सतगुरु ती समझे ,
उपजे शुद्ध विचार।
आप टेल अभिमान गले ,
कहे रविदास पुकार।
थई सरूपे रति ,
एक रहे न अणु।
आ जुग मा छे ,
देह अभिमान घणु। टेर ….


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gujarati bhajan lyrics in hindi

~ aa jug ma abhiman ghano ~

aa jug ma chhe ,
deh abhiman ghanu.
tene kari ne bhogve e,
aatam jeev aanu.


sanche man thi satguru sathe,
hoie n aanu het.
sant ne n namyo hari ne n gamyo,
ante thayo fajet.
sukh dukh maha vyape,
anand nhi aave anu.
aa jug ma chhe ,
deh abhiman ghanu.


mharu mharu karto prani,
jadu jatan kare.
aa sansar swapn sarikho,
arth n ek sare.
koi nathi tela e,
karan prabhudhedh tanu.
aa jug ma chhe ,
deh abhiman ghanu.


jay vijay ahnkare chadiya,
padiya droh ne dwar.
tu to prakat pamar prani,
kon matr vichar.
jase em udine re,
tur jem aak tanu.
aa jug ma chhe ,
deh abhiman ghanu.


tan abhiman man abhiman,
abhiman kahe.
jhuthyo bole chale,
lakh chourasi vahe.
bhajan hari no vesi ne,
n kidhu ek kshn.
aa jug ma chhe ,
deh abhiman ghanu.


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~ आ जुग मा देह अभिमान घणु ~

आ जुग मा छे ,देह अभिमान घणु।
तेणे करी ने भोगवे ई ,आतम जीव अणु।

सांचे मन थी सतगुरु साथे ,होइए न आणु हेत।
संत ने न नम्यो हरी ने न गम्यो ,अन्ते थयो फजेत।
सुख दुःख महा व्यापे ,आनंद नहीं आवे अणु।
आ जुग मा छे ,देह अभिमान घणु। टेर ….

महारु महारु करतो प्राणी ,जादू जतन करे।
आ संसार स्वप्न सरीखो ,अर्थ न एक सरे।
काई नथी लेता ए ,कारण प्रभुद्ध तणु।
आ जुग मा छे ,देह अभिमान घणु। टेर ….

जय विजय अहंकारे चढ़िया ,पड़िया द्रोह ने द्वार।
तू तो प्रकट पामर प्राणी ,कोण मात्र विचार।
जसे एम उडीने रे ,तुर जेम आक तणु।
आ जुग मा छे ,देह अभिमान घणु। टेर ….

तन अभिमान मन अभिमान ,अभिमान कहे।
झूठ्यो बोले चाले ,लख चौरासी वहे।
भजन हरी नो बेसी ने ,न किधु एक क्षणु।
आ जुग मा छे ,देह अभिमान घणु। टेर ….

सात शास्त्र सतगुरु ती समझे ,उपजे शुद्ध विचार।
आप टेल अभिमान गले ,कहे रविदास पुकार।
थई सरूपे रति ,एक रहे न अणु।
आ जुग मा छे ,देह अभिमान घणु। टेर ….

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भजन :- आ जुग मा छे देह अभिमान घणु
गायक :- प. नारायण स्वामी
लेबल :- राजस्थानी भजन

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