मैं तो उन रे संता रो हूँ दास जिन्होंने मन मार लिया भजन लिरिक्स | Me To Un Re Santan Ka Hu Das bhajan lyrics

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मैं तो उन रे संता रो हूँ दास जिन्होंने मन मार लिया भजन लिरिक्स

मैं तो उन रे संता रो हूँ दास जिन्होंने मन मार लिया भजन लिरिक्स, Me To Un Re Santan Ka Hu Das bhajan lyrics

।। दोहा ।।
संत मिल्या इतना टळे,काल जाल जम चोट।
शीश नमाया गिर पड़े, लख पापन की पोट।


~ में तो उण रे संतन को हु दास ~

में तो उण रे संतन को हु दास ,
जिन्होंने मन मार लिया।
मार लिया मन मार लिया ,
जिन्होंने मन मार लिया।


मन मारया तन वश किया जी ,
किया भरमाना दूर।
बाहर तो कुछ दिखत नाही ,
भीतर भलके वारे नूर।
में तो उण रे संतन को हु दास ,
जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….


आपा मार जगत में बैठ्या ,
नहीं किसी से काम।
उण में तो कुछ अंतर नाही ,
संत कहो जी चाहे राम।
में तो उण रे संतन को हु दास ,
जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….


प्याला पिया प्रेम का जी ,
छोड्या जग का मोह।
म्हाने सतगुरु ऐसा मिलिया ,
सहजा ही मुक्ति होय।
में तो उण रे संतन को हु दास ,
जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….


नरसी मेहता समरथ सामी ,
दिया अमी रस पाय।
एक बून्द सागर में रळगी ,
क्या करे रे यमराज।
में तो उण रे संतन को हु दास ,
जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….


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~ Me To Un Re Santan Ka Hu Das ~

me to un re santan ko hu das,
jinhone man mar liya.
mar liya man maar liya,
jinhone man mar liya .


man marya tan vash kiya ji,
kiya bharmana dur.
bahar to kuch dikhat nahi,
bhitar bhakle ware nur.
me to un re santan ko hu das,
jinhone man mar liya.


aapa mar jagat me baithya,
nhi kisi se kaam.
un me to kuch antar nahi,
sant kaho ji chahe ram.
me to un re santan ko hu das,
jinhone man mar liya.


pyala piya prem ka ji ,
chodya jag ka moh.
mhane satguru aisa miliya,
sahja hi mukti hoy.
me to un re santan ko hu das,
jinhone man mar liya.


narsi mehta samrath sami,
diya ami ras paay.
ek bund sagar me ralgi,
kya kare re yamraj.
me to un re santan ko hu das,
jinhone man mar liya.


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~ मैं तो उन रे संता रो हूँ दास ~

में तो उण रे संतन को हु दास ,जिन्होंने मन मार लिया।
मार लिया मन मार लिया ,जिन्होंने मन मार लिया।

मन मारया तन वश किया जी ,किया भरमाना दूर।
बाहर तो कुछ दिखत नाही ,भीतर भलके वारे नूर।
में तो उण रे संतन को हु दास ,जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….

आपा मार जगत में बैठ्या ,नहीं किसी से काम।
उण में तो कुछ अंतर नाही ,संत कहो जी चाहे राम।
में तो उण रे संतन को हु दास ,जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….

प्याला पिया प्रेम का जी ,छोड्या जग का मोह।
म्हाने सतगुरु ऐसा मिलिया ,सहजा ही मुक्ति होय।
में तो उण रे संतन को हु दास ,जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….

नरसी मेहता समरथ सामी ,दिया अमी रस पाय।
एक बून्द सागर में रळगी ,क्या करे रे यमराज।
में तो उण रे संतन को हु दास ,जिन्होंने मन मार लिया। टेर। ….

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भजन :- में तो उण रे संतन को हु दास
गायक :- हरि पटेल
लेबल :- राजस्थानी भजन

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